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बाबूलाल मरांडी की वापसी से भाजपा को नफा होगा या नुकसान?

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राष्ट्र चिंतन

ईसाई मिशनरियों की साजिश है मरांडी की भाजपा में वापसी

विष्णुगुप्त

बाबूलाल मरांडी क्या भाजपा के लिए अभिशाप बनेंगे? क्या बाबूलाल मरांडी भाजपा के संकट और अविश्वसनीयता को और भी खतरनाक बनायेंगे? क्या बाबूलाल मरांडी भाजपा कार्यकर्ताओं के मनोबल को और गिरायेंगेघ? क्या भाजपा ने बाबूलाल मरांडी को पार्टी में फिर से शामिल कराने की कसौटी पर कार्यकर्ताओं की राय लिया है? क्या बाबूलाल मरांडी के बिना भाजपा झारखंड के अंदर में फिर से मजबूत नहीं हो सकती है? क्या भाजपा में कोई और दूसरा आदिवासी नेता नहीं है जो भाजपा का सही नेतृत्व प्रदान कर सके? क्या भाजपा इतनी कमजोर हो गयी कि उसे अपनी मजबूती के लिए बाबूलाल मरांडी जैसे दलबदलू नेता की जरूरत है? उल्लेखनीय है कि बाबूलाल मरांडी की भाजपा में वापसी हो रही है, भाजपा के बड़े नेता भी ऐसा संकेत दे रहे हैं कि बाबूलाल मरांडी की वापसी अनिवार्य है. खुद बाबूलाल मरांडी कह चुके हैं कि उनकी अमित शाह से मुलाकात हुई है और भाजपा उनके लिए सहज विकल्प है. लेकिन बाबू लाल मरांडी के ही दो विधायक इसके खिलाफ हैं और उनके रूझान कांग्रेस की ओर है. उनके अधिकतर सेक्यूलर संस्कृति के नेता बाबू लाल मरांडी की भाजपा में वापसी के विरोधी हैं और भाजपा को सांप्रदायिकता के प्रतीक मानते हैं. बाबूलाल मरांडी ने अपने दो विधायकों को पार्टी से बाहर कर चुके हैं फिर भी विरोध की लहर कम नहीं हो रही है. सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि मरांडी के मौकापरस्त और दलबदलू राजनीति का बदबूदार उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है.

बाबूलाल मरांडी की अपनी कोई औकात न तो पहले थी और न ही आज है. फिर भाजपा उनके लिए इतनी आतुर क्यों. वास्तव में बाबू लाल मरांडी परजीवी राजनीति के सरताज रहे हैं. इनका अपना कोई राजनीतिक घराना भी नहीं था. अपने बल पर राजनीति करने की इनकी कोई खानदानी शक्ति भी नहीं थी. अगर संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री शंकर तिवारी और देव जी तथा तत्कालीन विश्व हिन्दू परिषद के प्रचारक और अभी-अभी रामजन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र के ट्रस्ट के सदस्य बने कामेश्वर चैपाल की परख दृष्टि नहीं होती तो फिर बाबू लाल मरांडी की राजनीतिक यात्रा और राजनीतिक उपलब्धि सामने आती ही नहीं. श्री शंकर तिवारी, देव जी और कामेश्वर चैपाल की परख दृष्टि बाबूलाल मरांडी पर पड़ी थी. रांची के चर्च रोड स्थित विश्व हिन्दू परिषद के कार्यालय में कार्यालय मंत्री के रूप में इनकी पहली नियुक्ति थी जहां पर इनकी भोजन बनाने की कला काफी मशहूर थी. राजनीतिक शिक्षा जब इनकी पूरी हुई तब इन्हें संथाल परगना क्षेत्र में संगठन मंत्री का दायित्व दिया गया था. उस काल में भाजपा को संथाल परगना में शिबू सोरेन के सामने एक आदिवासी नेता की जरूरत थी. इसलिए बाबूलाल मरांडी की छवि विकसित करने में संघ परिवार ने काफी कार्य किया था. शिबू सोरेन से मुकाबले के निमित ही इन्हें भाजपा के वनांचल समिति के अध्यक्ष बनाया गया था. वनांचल समिति के अध्यक्ष के रूप में बाबूलाल मरांडी की छवि एक कट्टर हिन्दू नेता की थी. बाबूलाल मरांडी क्रिश्चियन मिशनरी और जिहादी संस्कृति के खिलाफ आवाज उठा कर भाजपा के अंदर मजबूत नेता बने थे. इन्होंने शिबू सोरेन को दुमका क्षेत्र में हरा कर वाजपेयी सरकार में मंत्री बने. जब बिहार से झारखंड अलग राज्य बना तब बाबूलाल मरांडी पहले मुख्यमंत्री बने थे. इनकी सड़क से मुख्यमंत्री तक की यात्रा में संघ और भाजपा की ही देन थी, संघ और भाजपा ने बड़े ईमानदार और बड़ी छवि वाले कड़िया मुंडा, यमुना सिंह जैसे आदिवासी नेताओं की जगह बाबूलाल मरांडी को आगे बढाने के काम किया था पर सहयोगी दलों की बगावत के कारण मरांडी को अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी थी. अपनी जगह इन्होंने दूसरी संस्कृति से आये अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री की कुर्सी थमायी थी. फिर अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री की कुर्सी और भाजपा की राजनीति में जम गये. बाबूलाल मरांडी अपने लिए अर्जुन मुंडा को काल मान बैठे.

राजनीतिज्ञ गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं. अपनी कुर्सी के लिए पैंतरेबाजी पर पैंतरेबाजी करते हैं. भारतीय राजनीति में ऐसे-ऐसे उदाहरण बार-बार देखने को मिलते हैं. बाबूलाल मरांडी भी गिरगिट की तरह रंग बदले थे, पैंतरेबाजी पर पैंतरेबाजी दिखायी थी. भाजपा को ब्लैकमेल पर ब्लैकमेल किया था. धमकी यह पिलायी थी कि मुझे फिर से मुख्यमंत्री बनाओ, झारखंड में भाजपा को मेरे पैरों के नीच खड़ा करो, नहीं तो फिर मैं पार्टी तोड़ दूंगा. अलग पार्टी बना लूंगा. यह अनैतिक राजनीति की पराकाष्ठा थी. भाजपा ने जब बाबूलाल मरांडी की शर्ते मानने से इनकार कर दिया तो फिर बाबूलाल मरांडी ने अपना असली चेहरा दिखाना शुरू कर दिया. उन्होंने भाजपा तोड़ डाली. कई विधायक और कई नेता बाबूलाल मरांडी के शरणागत हो गये. झारखंड विकास मोर्चा नाम की अलग पार्टी बना डाली.

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झारखंड विकास मोर्चा की राजनीतिक यात्रा कोई धमाकेदार नहीं रही. झारखंड का नेतृत्व करने की राजनीतिक क्षमता हासिल करने के सपने टूट गये. स्वयं के बल पर राजनीति के सरताज बनने की शक्ति उनमें नहीं थी. वे तो परजीवी थे, असली शक्ति तो भाजपा और संघ परिवार की थी, जिसे मरांडी अपना समझ बैठे थे. बाबूलाल मरांडी अनैतिकता दिखाते हुए उसी भाजपा को चुनौती दे रहे थे. उसी भाजपा को जमींदोज करने की कसमें खाते थे जिस भाजपा ने उनकी राजनीतिक जीवन का संवारा था. सड़क से उठा कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाया था. इनकी राजनीतिक पार्टी सभी दलों से निष्कासित और हाशिये पर खड़े लोगों का जमावड़ा बन गयी थी. कोई एक चुनाव नहीं बल्कि कई चुनावों में झारखंड की जनता इन्हें बार-बार लात मार रही थी. 2019 के लोकसभा चुनाव में भी बाबूलाल मरांडी खुद लोकसभा का चुनाव एक अदने से आदमी से हार गये थे. इसके पूर्व भी ये विधान सभा चुनाव हार गये थे. 2019 के झारखंड विधान सभा चुनाव में इन्होंने खूब पैंतरेबाजी की थी. अहंकार भरा था कि सत्ता उनके हाथ में आयेगी. पर जब चुनाव आया तो किसी तरह सिर्फ तीन ही विधानसभा क्षेत्रों में उनकी पार्टी को कामयाबी मिली थी. सत्ता भाजपा की गयी और वह झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस के गठबंधन वालों के पास चली गयी. वर्षो-वर्षों तक भाजपा से अलग रह कर मरांडी न केवल हताश हुए हैं बल्कि थक भी गए. उन्हें अब विश्वास हो गया है कि उनकी राजनीति स्वयं के बल पर नहीं बल्कि भाजपा के बल पर आगे बढ सकती हैण्

राजनीति में एक नियम है, जो राजनीतिज्ञ अपनी मौत मर रहा है उसे मरने दो, जिंदा मत करो, जिंदा करोगे तो फिर वह आत्मघाती बन जायेगा. पर भाजपा हमेशा इस नियम के उलट व्यवहार और राजनीति करती है. उदाहरण देख लीजिये. जब नीतीश कुमार लालू से अलग हुए थे तब उनकी कोई अपनी औकात नहीं थी. भाजपा ने आत्मघाती तौर पर नीतीश कुमार की औकात बढायी. खाने पर आमंत्रित कर नरेन्द्र मोदी और भाजपा के नेताओं को नेवता रदद कर लात मारी थी. भाजपा को छोड़ कर उसी जंगल राज यानी लालू के साथ समझौता कर सरकार बनायी थी जिस जंगल राज के खिलाफ वह जनादेश प्राप्त करता था. रामविलास पासवान बिहार में राजनीतिक तौर हासिये पर खड़े थे और भाजपा को वह भारत जलाओ पार्टी कहते थे पर भाजपा ने उन्हें फिर से जिंदा कर दिया. उत्तर प्रदेश में भाजपा ने अपना दल जैसे कई छोटे दलों को अपनी राजनीतिक हवा के दौर में स्थापित कर दिया. अब हताश, थके हुए और राजनीतिक तौर पर मृत प्राय बाबू लाल मरांडी को भाजपा जिंदा क्यों कर रही है, भाजपा अपनी पार्टी में लेकर बाबूलाल मरांडी के तौर पर अपने लिए एक और भस्मासुर क्यों पैदा कर रही है.

बाबूलाल मरांडी से भाजपा को खतरे क्या है, यह भी देख लीजिये. आज की तारीख में बाबूलाल मरांडी किसी भी दृष्टिकोण से भाजपा के कार्यकर्ताओं की कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं. न जाने कितनी गालियां इन्होंने भाजपा के खिलाफ बकी हैं. कितनी खतरनाक प्रवृतियां इन्होंने गढी थी. नरेन्द्र मोदी से लेकर अमित शाह तक की आलोचना में इन्होंने उदारता नहीं बरती थी. सबसे बड़ी बात यह है कि आज के समय में बाबूलाल मरांडी पूरी तरह सेक्यूलर और ईसाई मिशनरी के सहचर हो गये हैं. झारखंड के जानने वाले लोग यह जानते हैं कि बाबूलाल मरांडी सेक्यूलर और ईसाई मिशनरी के हाथों पूरी तरह से खेल रहे हैं. सेक्यूलर अराजक और घोर राष्ट्रविरोधियों और एनजीओ जिनका एक मात्र उद्देश्य भाजपा का विरोध करना है के साथ बाबूलाल मरांडी के गहरे रिश्ते हैं. बड़ा गंभीर तालमेल है. खासकर क्रिश्चिन मिशनरी को राजनीतिक शक्ति हासिल कराने में बाबूलाल मरांडी की भूमिका तेजाबी थी. आदिवासियों को भाजपा विरोध में खड़ा करने के पीछे भी मरांडी की तेजाबी भूमिका रही है. बहुत सारे लोगों का कहना है कि ईसाई मिशनरियों की साजिश के तहत बाबूलाल मरांडी की भाजपा में वापसी हो रही है. ईसाई मिशनरी भी बाबूलाल मरांडी की भाजपा वापसी में दिलचस्पी इसीलिए ले रही है.

जिन भाजपा कार्यकर्ताओं ने बाबूलाल मरांडी की इस भूमिका के खिलाफ राजनीतिक अभियान चलाये थे उन भाजपा कार्यकर्ताओं को मरांडी का नेृतत्व कैसे स्वीकार होगा. मरांडी भाजपा में आयेंगे तो फिर सेक्यूलर और क्रिश्चियन संस्कृति तथा जिहादी संस्कृति को लादना और स्थापित करना चाहेंगे. उन्हें चरम नेतृत्व से कम तो स्वीकार नहीं होगा.

भाजपा के पास एक पर एक से एक आदिवासी नेता हैं. केन्द्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा, कड़िया मुंडा और सुदर्शन भगत जैसे दर्जनों आदिवासी नेता हैं, जिनकी भाजपा संगठन में पैठ भी अच्छी है. कंडि़या मुंडा की ईमानदारी और संगठन क्षमता प्रेरणादायी है. पर भाजपा अपने समर्पित आदिवासी नेतृत्व को आगे न बढा कर मरांडी को आगे क्यों बढाने पर तुली हुई है. अगर मरांडी भाजपा में आते हैं और इन्हें झारखंड में भाजपा नेतृत्व दिया जाता है तो फिर यह आत्मघाती कदम ही माना जायेगा.

(यह लेखक के अपने विचार हैं. )

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