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व्यंग्य : ईमानदार आदमी की प्रदर्शनी

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नवेंदु उन्मेष.

नवेन्दु उन्मेष

तुलसीदास ने लिखा है जब-जब होई धरम की हानि बाढ़ ही असुर-अधम अभिमानी, तब-तब प्रभु धरि विविध शरीरा, हरही कृपा विधि सज्जन पीड़ा।

इसमें यह नहीं कहा गया है कि धरम की हानि होने पर किसी जाति विशेेष की पीड़ा हरने के लिए भगवान का अवतरण होगा। लेकिन वर्तमान समय में खुल कर धर्म की हानि हो रही है। आदमी आदमी का दुश्मन बन बैठा है। आदमी जाति और संप्रदाय में बंट चुका है। आदमी एक-दूसरे को गालियां देने से भी परहेज नहीं करता। राजनीतिक दल भी वोट के लिए आदमी को आदमी से बांटने के फेर में लगे रहते हैं। वोट ऐसा जहर है जिसे पीने से आदमी जहरीला हो जाता है। इसके बाद गांव और शहर में जहर का बीज बोना शुरू कर देता है।

राजनीतिक दल आदमी को आदमी से बांटने का पौधारोपण करते हैं और जब वह पौधा बड़ा हो जाता है तो उसका फल लोगों खिलाकर सत्ता की रोटी सेकते हैं। दफ्तर में ईमानदारी से काम करने वाले को लोग बेवकूफ और पागल समझते हैं। इससे जाहिर होता है कि आदमी ईमानदारी की दुनिया से भटक चुका है और भ्रष्टचार की दुनिया में प्रवेश कर चुका है। हर तरफ भ्रष्टाचार की बदबू आती हुई नजर आती है।

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हर तरफ घपले और घोटाले की आवाज सुनायी पड़ती है। ऐसी स्थिति में भगवान कब आयेंगे और दुर्जनों का नाश कब करेंगे कहा नहीं जा सकता। लेकिन यह तो तय है कि आने वाले समय में देश के विभिन्न भागों में ईमानदार आदमी की प्रदर्शनी लगाकर बताना पड़ेगा कि यह 19 सदी का ईमानदार आदमी था और यह 20 सदी का ईमानदार आदमी था। इस ईमानदार आदमी ने लोगों के विकास के लिए यह काम किये और इस आदमी ने ईमानदारी से अपने काम को अंजाम देकर समाज सेवा का काम किया। तब ईमानदार आदमी की प्रदर्शनी देखने के लिए लोग आयेंगे। तब न किसी सीबीआई की जरूरत पड़ेगी और न किसी भ्रष्टाचार निगरानी ब्यूरो की।

यह भी संभव है कि ईमानदार आदमी का संग्रहालय भी स्थापित करना पड़ेगा और आने वाली पीढ़ी को यह बतलाना पड़े कि पूर्व समय में ईमानदार आदमी ऐसा होता था। ईमानदार आदमी इस तरह रहता था और इस तरह खाता-पीता था। इसके बाद भी जब कोई ईमानदार आदमी मिल जायेगा तो लोग उसका स्वागत करेंगे। उसकी जय-जयकारे करेंगे और जुलूस निकाल कर लोगों को बतायेंगे कि भ्रष्टाचार के इस युग में एक ईमानदार आदमी हमलोगों ने खोज निकाला है।

इतना ही नहीं आने वाले दिनों में सरकार ईमानदार आदमी पर शोध करने के लिए पैसे देगी। यह भी संभव है कि विलुप्त होती आदिम जनजातियों को संरक्षण देने के लिए जिस तरह सरकार की योजनाएं चलती हैं उसी प्रकार ईमानदार आदमी को संरक्षण देने के लिए योजनाएं चलायी जायेंगी और उसे पूरी सुरक्षा इसलिए दी जायेगी कि तब तक कुछ ही ईमानदार आदमी धरती पर नजर आयेंगे।

भ्रष्टाचार के युग में सरकार तब ईमानदार आदमी संरक्षण आयोग गठित करेगी और ईमानदार आदमी को उपर उठाने के लिए येाजनाएं बनायेगी। तब ईमानदार आदमी को कम कीमत पर राशन दिया जायेगा। तब ईमानदार आदमी की अलग से काॅलानी बसायी जायेगी। तब ईमानदार आदमी को मुफ्त में चिकित्सा से लेकर आवास तक की सुविधा प्रदान की जायेगी।

तब यह भी संभव है कि ईमानदार आदमी को नौकरी में आरक्षण भी मिले। ईमानदार आदमी की कथा तब किताबों में कोर्स की किताबों में पढ़ने को मिलेगा। कोर्स में पढ़कर बच्चे जानेंगे कि ईमानदार आदमी कैसे बना जा सकता है। तब ईमानदार आदमी की उत्पति और विकास पर चर्चा की जायेगी। तब ईमानदार आदमी की कला-संस्कृति और भाषा पर चर्चा की जायेगी।

(लेखक व्यंगकार व वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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