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मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नाम एक पत्रकार का खुला पत्र

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आदरणीय हेमंत जी,

नमस्कार-जोहार,

आपको दूसरी बार झारखंड का मुख्यमंत्री बनने के लिए बधाई एवं शुभाकामनाएं. आपने ऐसे समय में राज्य के मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली है जब राज्य और देश आर्थिक चुनौतियों एवं सुस्ती का सामना कर रहा है और नागरिकता कानून एवं एनआरसी के विरोध की लपटें देश में जगह-जगह बिखेरी हुई हैं. आप एक जनजातीय बहुल राज्य के मुख्यमंत्री हैं, जहां स्थायी तौर पर कई सवाल उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं. आपकी पार्टी इन्हीं सवालों पर बनी व खड़ी हुई है और आप किसी औसत आदमी से इन मसलों को अधिक अच्छे से समझते एवं जानते हैं. तो आपसे यह अपेक्षा होगी कि आप इनका सामना बड़ी कुशलता से करेंगे.

मुख्यमंत्री जी, 23 दिसंबर को प्राप्त हुए दिग्विजय के बाद से आपके पास मुलाकातियों का तांता लगा हुआ है, लोगों ने आपको अपनी शुभेच्छाएं अपने-अपने अंदाज में दीं. आपने विनम्रता से उन्हें स्वीकार किया और बुके नहीं बुक मांग कर एक राजनेता के तौर पर आपने माइलेज भी ली. आपने फिर अपने पूर्ववर्ती रघुवर दास के खिलाफ थाने में की गयी शिकायत वापस लेकर अच्छा संकेत दिया और वास्तविक रूप में एक नेता के रूप में सामने आए. आपने ट्विटर एकाउंट पर लोगों के प्यार के प्रति आभार को टैग किया. यह भी विशिष्ट है, क्योंकि चेहरा चमकाने के दौर में आप कोई और तसवीर भी अपने ट्विटर एकांउट पर पीन कर सकते थे. राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी से आप मिले और उनके प्रति आपने गहरा सम्मान प्रकट किया. राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के राजनीतिक कटुता व शत्रुता में रूपांतरित हो चुके होने के इस दौर में यह पहल भी सराहनीय है.

मुख्यमंत्री जी, पिछले एक सप्ताह के इन अहम प्रसंगों की चर्चा करने का यह आशय कतई नहीं है आपका स्तुति गान करूं. एक पत्रकार के रूप में आपकी ये चार पहल अच्छी लगीं तो उनका उल्लेख किया. लेकिन, असल चुनौती इन नेक प्रयासों को आगे भी कायम रख पाना है.

आपको ध्यान होगा कि दिसंबर 2014 में जब आपकी जगह श्री रघुवर दास मुख्यमंत्री बने थे तो उस समय इसे भी ऐतिहासिक परिघटना माना गया. था भी. तब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था कि राज्य में पहली बार पूर्ण एवं स्पष्ट बहुमत की सरकार बनने जा रही है. उन्होंने अपने संववादाता सम्मेलन में बड़ी बारीकी से यह उल्लेख किया था कि कैसे सत्तापक्ष के बड़े नेता चुनाव हार गए. उसमें अन्नपूर्णा जी और आप भी शामिल थे. इस बार परिदृश्य बदल गया है. तो मेरे कहने का आशय यह है कि एक जीत उत्साहित करती है, हार निराश करती है, लेकिन जीत अहंकार न पैदा करे और हार नैराश्य के भंवर में न उलझा दे.

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मुख्यमंत्री जी, हमेशा अच्छा-अच्छा सुनाने वाले व कहने वाले कभी किसी का भला नहीं करते और कम से कम राजनेताओं का तो बिल्कुल नहीं. आप अब जब मुख्यमंत्री बन चुके हैं तो आपके इर्द-गिर्द हमेशा दर्जनों लोग होंगे, लेकिन आपके पास एक ऐसा सूचना तंत्र होना चाहिए जो आपको पूरे सूबे सहित आपके निर्वाचन क्षेत्र की सही सूचनाएं दे. वे सूचनाएं भी जो आपको नाराज या कभी-कभी निराशा भी कर दे, ताकि आप उससे निबट सकें. जैसा आप स्वयं मानते हैं कि पत्रकार जमीनी हालात को अच्छे से बता सकते हैं, क्योंकि वे जगह-जगह घूमते हैं और अलग-अलग लोगों से बातें करते हैं तो मैं यह कहना चाहूंगा कि फ्री प्रेस किसी सरकार की सेहत के लिए भी जरूरी होता है ताकि सरकार सही सूचनाएं जान सके, ऐसा नहीं हो कि प्रेस स्तुति गान गाता रहे और पैरों के नीचे की जमीन खिसक जाये.

यह सब जानते हैं कि जब प्रेस नहीं था तो शासक भेष बदल कर यह जानने जनता के बीच जाते थे कि वे उनके बारे में क्या सोचते हैं, उनकी पीड़ा क्या है. अधिकतर यशस्वी राजाओं ने ऐसा किया है. आज तो प्रेस यह काम कर रहा है, इसलिए उसे दबाव मुक्त होकर यह काम करने देना चाहिए. हां, किसी रूप में किसी पक्ष द्वारा एजेंडा आधारित काम नहीं होना चाहिए.

आप झारखंड में अबतक सबसे बड़े बहुमत वाले सीएम हैं, जिन्हें कम से कम 50 विधायकों का समर्थन हासिल है. यह संख्या बल लोगों की आपसे निर्णायक पहल की उम्मीदें बढा देता है. सबको यह उम्मीद है कि आप समर्थ मुख्यमंत्री हैं तो निर्णायक कदम उठाएंगे.

लोकप्रिय फैसले और राज्य की अर्थिक सेहत की बीच संतुलन, पिछड़ा आरक्षण लागू करने के दौरान जातीय कटुता न बढे और वह ऐसा हो कि बाद में कोर्ट-कचहरी के पचड़े में पड़ कर खारिज नहीं हो जाये, ये अहम बिंदु हैं जिसको लेकर जनमानस में सवाल हैं.

स्थानीय नीति को परिभाषित करने के दौरान आपकी सरकार के कौशल की परीक्षा होगी. आदिवासियों व मूलवासियों के हितों की रक्षा झारखंड की किसी भी सरकार की प्राथमिकता होनी ही चाहिए, लेकिन रोजी-रोजगार की तलाश में यहां आ बसे दूसरे प्रांतों के लोग जो अब इसी सूबे को अपना घर मानते हैं, उनकी उपेक्षा भी न हो. उनके जेहन में दूसरे दर्जे का नागरिक होने का भाव न भरे, यह जरूरी है. किसी भी शहर, सूबे व देश को सफल व विशिष्ट बनाने में वहां रह रहे सभी तबके का योगदान होता है. अमेरिका को दुनिया भर के लोगों ने सबसे समर्थ एवं संपन्न बनाया है.

आखिरी बात मैं यह कहना चाहूंगा कि अगर सरकार के फैसलों का आधार ये तीन बिंदु हों तो अधिकतर समस्याएं यूं ही खत्म हो जाएंगी : पहला अंतिम-वंचित व्यक्ति का विकास व कल्याण, दूसरा सामाजिक सदभाव और तीसरा सूबे की आर्थिक सेहत.

मुख्यमंत्री जी, पुनः आपको कोटि-कोटि शुभकामनाएं. आप यशस्वी बनें और पद पर रहें या न रहें आपका योगदान देश-समाज याद करे.

राहुल
एक पत्रकार 

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