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झारखंड : लुभावने चुनावी वादों के बाद हेमंत के लिए आगे की राह कितनी चुनौती भरी होगी?

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राहुल सिंह

रांची : झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन झारखंड के नये मुख्यमंत्री होने जा रहे हैं. चुनाव में विजयी हुए झामुमो-कांग्रेस-राजद गठबंधन के नेता की हैसियत से हेमंत सोरेन 29 दिसंबर को रांची के ऐतिहासिक मोरहाबादी मैदान में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे. इस शपथ ग्रहण में तमाम दिग्गज राजनेताओं के साथ हेमंत व्यक्तिगत रूप कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिल कर उन्हें शामिल होने का न्यौता देने वाले हैं. झारखंड में आमतौर पर खुले व विशाल मैदान में मुख्यमंत्री के शपथ लेने की परंपरा नहीं रही है और अन्य राज्यों में किए जाने वाले ऐसे प्रयासों को शक्ति प्रदर्शन व जनता से कनेक्ट होने का माध्यम माना जाता है. जाहिर है हेमंत सोरेन ने जब ऐसा निर्णय लिया होगा तो ये दोनों बातें उनके दिमाग में भी होंगी.

 

झामुमो का निश्चय पत्र और राज्य की आर्थिक सेहत

 

हेमंत सोरेन के चुनावी निश्चय पत्र के तीसरे पेज पर लिखा है : इतिहास साक्षी है कि सत्ता के नशे में चूर अनगिनत जुल्मी तानाशाहों को अहंकार के समंदर ने निगल लिया. यानी इस कथन का दूसरा पहलू यह है कि हेमंत को मुख्यमंत्री के रूप में अपनी सहजता-सुलभता, जनता से कनेक्ट और संवाद बना कर रखना होगा और हर वर्ग के लिए समान व्यवहार की राह ही अख्तियार करनी होगी. इससे उनकी राजनीति और आधार दोनों का विस्तार ही होगा. हेमंत सहज-सौम्य हैं, जिससे उनसे ऐसी ही उम्मीद लोगों ने पाल रखी है.

हेमंत सोरेन के निश्चय पत्र घोषणा पत्र में कई लोकलुभावन वाले किए गए हैं, जिसे पूरा करना बहुत आसान नहीं होगा. रघुवर सरकार की विदाई और हेमंत सरकार के आगमन के बीच के संक्रमण काल में राज्य के एक प्रमुख अखबार ने यह खबर दी है कि सरकार का खजाना खाली है और वेतन देने के लिए पैसे नहीं हैं. दैनिक भास्कर अखबार ने 24 दिसंबर को लिखी अपनी खबर में कहा कि सरकार को ओवर ड्राफ्ट से अपना काम चलाना होता है और 19 दिसंबर को राज्य के खजाने में केवल 654 करोड़ थे. अखबार ने लिखा कि पिछले डेढ साल में राज्य की वित्तीय स्थिति बिगड़ी है. अखबार के अनुसार, केंद्र सरकार से 1800 करोड़ रुपये कर्ज लेकर खजाने में सरकार ने 1925 करोड़ रुपये जुटाये.

उक्त अखबार के इस खबर का उल्लेख हमने सिर्फ संदर्भ के रूप में किया है. अब हम राज्य के वास्तविक आंकड़ों पर बात करते हैं, जिससे इसके वित्तीय ढांचे को समझा जा सके. झारखंड की जीएसडीपी (राज्य का सकल घरेलू उत्पादन) 2017-18 के 10.22 से घट कर 2018-19 में 6.8 हो गया है. वित्त वर्ष 2011-12 से 2018-19 के बीच राज्य की औसत विकास दर 5.8 प्रतिशत रही है. सरकार के आर्थिक सर्वे के अनुसार ही यह औसत 2013-14 और 2015-16 के कम विकास दर के कारण गिर गया. यानी चुनौतियां तो आर्थिक मोर्चे पर है हीं.


राज्यपाल से मिल कर सरकार बनाने का दावा पेश करते हेमंत सोरेन. फोटो स्रोत: हेमंत का ट्विटर एकाउंट.

 

संख्या बल के हिसाब से अबतक की सबसे मजबूत सरकार

 

चुनौतीपूर्ण आर्थिक ढांचे के बीच यह अच्छी बात है कि मुख्य विपक्ष के रूप में सामने आयी भाजपा और उसकी पुरानी सहयोगी आजसू को छोड़कर हेमंत सोरेन ने बड़ी विनम्रता से सभी राजनीतिक घटकों का समर्थन हासिल किया है. उन्होंने बाबूलाल मरांडी की पार्टी का भी बिना शर्त समर्थन अपनी विनम्रत की बदौलत ही पाया है. यानी 50 से अधिक विधायकों वाली झारखंड के दो दशक के राजनीतिक इतिहास में यह पहली सरकार होगी. ऐसे में यह आवश्यक होगा कि राज्य की सेहत सुधारने के लिए हेमंत बेहद ठोस कदम उठायें, जिसमें गांव, गरीब, आदिवासी, किसान, महिला एवं बच्चों, युवाओं व बुजुर्गाें पर विशेष फोकस हो. आर्थिक सहित अन्य मोर्चाें पर हेमंत ऐसे साहसिक फैसले ले सकते हैं, जिससे राज्य की सूरत बदले.

 

चुनावी वादे को निभाना चुनौती

 

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पार्टियां अक्सर चुनाव में लोकलुभावन वादे करती हैं. इनमें सेे कई वादे पूरे किये जाते हैं तो कई अधूरे भी रह जाते हैं. भारतीय गणराज्य के कई राज्यों में कई दफा यह देखा गया है कि चुनाव के लोकलुभावन वादों को निभाने में खजान पर अध्यधिक दबाव बन जाता है और जिससे राज्य की माली हालत और खराब हो जाती है, जिसका दूरगामी नुकसान राज्य, वहां की जनता एवं बाद के सालों में सरकार को होता है. भले ही फौरी तौर पर भले ही तीनों उससे फायदे में क्यों नहीं दिखते हों.

अतः किसी परिपक्व सरकार से यह अपेक्षा की जाती है कि वह लोकलुभावन फैसलों और सरकारी खजाने के सेहत के बीच तारतम्य बना कर ही आगे बढे.


पिता शिबू सोरेन के साथ हेमंत सोरेन नवनिर्वाचित विधायकों से मुलाकात करते हुए.

झामुमो के चुनावी वादे में आर्थिक मोर्चे पर क्या है खास?

 

झामुमो ने बेरोजगार स्नातकों को पांच हजार व पोस्ट ग्रेजुएट को सात हजार रुपये भत्ता देने का वादा किया है. झारखंड जैसे राज्य में जहां बेरोजगारी की दर दो अंकों में है, वहां इस वादे को पूरा करने में खजाना पर काफी बोझ पड़ेगा.

गरीब परिवार की महिलाओं को हर माह झामुमो ने दो हजार रुपये चूल्हा खर्ज देने का वादा किया है. इस लागू करना भी खासा खर्चिला होगा. झामुमो ने सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से एक अच्छा वादा किया है कि वृद्धजनों, दिव्यांगों, विधवा महिलाओं को पेंशन के रूप में 2500 रुपये दिये जाएंगे. इस फैसले को लागू करने में भी आर्थिक बोझ पड़ेगा, लेकिन यह एक सराहनीय निर्णय है, क्योंकि यह तबका आर्थिक रूप से असुरक्षित है, अभी जो पेंशन की रकम है वह पर्याप्त नहीं है. लेकिन, सरकार को इसमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि इसका लाभ वास्तविक लाभार्थियों को ही मिले, संपन्न लोगों को किसी सूरत में नहीं. गरीब परिवार को 10 रुपये में धोती, साड़़ी, लुंगी देने का एलान भी लोकलुभावन होने के बावजूद सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने की दिशा में एक पाॅजिटिव कदम है.

झामुमो ने धान का समर्थन मूल्य 2300 से 2700 करने का वादा किया है. ऐसा फैसला भी अच्छा साबित होगा. झामुमो ने किसान कर्ज माफी का वादा किया है. कांग्रेस का तो हाल के कई चुनावों से यह सबसे बड़ा वादा होता है और सबसे पहले अपने राज्यों में वह इसी संबंध में फैसले लेती है, जाहिर है सोनिया-राहुल चाहेंगे कि हेमंत सरकार भी प्राथमिकता से यह फैसला ले. इस वादे में घोषणा पत्र मे बहुत स्प्ष्टता नहीं है, इसलिए इसका स्वरूप और दायरा देखना होगा.

महिलाओं को नौैकरी में 50 प्रतिशत आरक्षण का वादा किया गया है. झामुमो ने स्थानीय रोजगार अधिकार कानून बनाने की बात कही है, और कहा है कि राज्य के निजी क्षेत्रों में 75 प्रतिशत नौकरियां स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित किया जाएगा. निजी क्षेत्र में किसी प्रकार का आरक्षण राष्ट्रीय विमर्श का विषय है और इस पर काफी वाद-विवाद रहा है. ऐसे में इस पर नयी सरकार क्या कदम उठाती है निगाह इस पर भी होगी. उद्योग जगत की प्रतिक्रिया भी इस बिंदु पर देखनी होगी.


क्रिसमस के शुभ मौके पर ईसाई धर्मगुरुओं के साथ हेमंत सोरेन.

असाध्य रोग का मुफ्त इलाज, लड़कियों को मुफ्त पीएचडी तक की शिक्षा एक लोक कल्याणकारी राज्य में सराहनीय पहल ही मानी जाती है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए अगर इस पर सही ढंग से अमल हो तो. हेमंत ने छात्रों को चार लाख रुपये तक का स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड देने का वादा किया है. यह भी तारीफ योग्य वादा है. ऐसे में इसकी प्रासंगिकता तब और बढ जाती है जब कुछ पखवाड़े पूर्व ही सूबे के एक छात्र ने बैंक से लिए गए शिक्षा कर्ज की वसूली के लिए बनाए गए दबाव की वजह से आत्महत्या कर ली थी.

झामुमो एक एक बड़ा वादा है कि वह 2004 के बाद सरकारी सेवा में बहाल हुए लोगों की पेंशन सरकार में आने पर बहाल कर देगा. अगर सरकार यह फैसला लेती है तो इससे खजाने पर काफी बोझ पड़ने की संभावना है. दरअसल अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के आखिरी साल में तब नियुक्त होने वाले लोगांे की पेंशन रोकने का केंद्र स्तर पर निर्णय लिया गया था. अनुबंध पर नियुक्ति की परंपरा को खत्म करने व उन्हें स्थायी करने का एलान भी बड़ा वादा है.

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