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ग्राउंड रिपोर्ट : जमशेदपुर पूर्वी में कैसी है रघुवर-सरयू की टक्कर?

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जमशेदपुर से राहुल सिंह

टाटानगर रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद अपने ठिकाने तक पहुंचने के लिए मैं जिस आटो पर सवार होता हूं, उसके ड्राइवर से थोड़ा सहज होने के बाद राजनीतिक चर्चा छेड़ता हूं. क्या चुनावी माहौल है, पूछते ही तकरीबन 50 साल का वह शख्स चंद मिनटों में शहर के बदहाल हो रहे औद्योगिक ताने-बाने की तसवीर खींच कर रख देता है. अनिल कुमार मिश्रा नामक वह शख्स कल कारखानों के बंद हो जाने और चालू कारखानों में भी श्रमिकों को हर महीने 10-10 दिन बैठा दिए जाने का जिक्र करते हैं.

मेरेे बगल में बैठा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा 24 साल का युवा अंकुश तो बस उबल पड़ता है. अंकुश बिरसानगर बस्ती में रहता है और ट्यूशन पढाकर गुजारा करता है. वह एक साथ जमशेदपुर के तीन अहम मुद्दों का प्रतिनिधित्व करता दिखता है – 86 बस्तियों का मालिकाना हक, कारखानों के बंद या सुस्त होने से शहर में रोजगार के सीमित विकल्प और नौकरियों का संकट.

जमशेदपुर शहर के आर्थिक सेहत की समझ टाटा मोटर्स में काम कर रहे युवा सत्यप्रकाश से मिलती है. सत्यप्रकाश को इस बात का संतोष है कि वह अब स्थायी कर्मचारी बन गया है. वह कहता है कि ऐसा नहीं होने पर उसे अभी काम नहीं मिलता और उसकी कमाई बंद हो जाती. सत्यप्रकाश कहता है कि पिछले सात-आठ महीने से मंदी के कारण वह ए शिफ्ट की ड्यूटी करता है, क्योंकि कंपनी में उतना काम या आर्डर नहीं है. आजकल गाड़ियां कम जो बन रही हैं. हालांकि 4.5 प्रतिशत पर पहुंची जीडीपी, कोर सेक्टर के खराब आंकड़े एवं गिरती विकास दर के कारण यह राष्ट्रीय मुद्दा है, लेकिन जमशेदपुर में यह लोगों का माइंडसेट बनाने का अहम फैक्टर है क्योंकि राज्य का मुख्यमंत्री इसी शहर के हैं. भारत में किसी सूबे में निवेश लाने का श्रेय अगर मुख्यमंत्री को मिलता है तो सुस्त औद्योगिक इकाइयों में जान फूंकवाने का प्रयास करना भी उनका ही काम माना जाता है.

जमशेेदपुर में तीन विधानसभा सीटें हैं: जमशेदपुर पूर्वी, जमशेदपुर पश्चिमी और जुगसलाई. जुगसलाई सीट अर्द्धशहरी-अर्द्धग्रामीण परिवेश की है, वहीं जमशेदपुर पूर्वी एवं पश्चिमी विशुद्ध शहरी सीटें हैं. इनमें 2014 के चुनाव में दो सीटें पूर्वी एवं पश्चिमी भाजपा ने और जुगसलाई उसकी सहयोगी आजसू ने जीती थी. इस बार तीनों पर कड़ी टक्कर है. जुगसलाई में आजसू एवं भाजपा दोनों मैदान मेें हैं जिससे प्रेक्षकों को झामुमो की राह आसान नजर आती है, जबकि पश्चिमी में कांग्रेस के बन्ना गुप्ता भाजपा के नए उम्मीदवार को (सरयू की अनुपस्थिति में) कड़ी टक्कर दे रहे हैं.

जमशेदपुर पूर्वी सीट से झारखंड भाजपा के चेहरा बन चुके मुख्यमंत्री रघुवर दास 1995 से लगातार चुनाव जीतते रहे हैं और जमशेदपुर पश्चिमी सीट सरयू राय की मानी जाती रही है, जहां उन्होंने जीत व हार दोनों का स्वाद चखा. सरयू राय बिहार-झारखंड में भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं और उनकी व्यापाक स्वीकार्यता पार्टी के दायरे से बाहर भी है. वे जेपी आंदोलन की उपज हैं और राजनीति, पर्यावरण के साथ भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी काम करते हैं. ये सब चीजें उनके व्यक्तित्व को समकालीन राजनेताओं में विशिष्ट बनाती हैं. यह माना जाता है कि लालू प्रसाद यादव एवं मधु कोड़ा को भ्रष्टाचार के आरोपों में सजा होने में उनकी अहम भूमिका रही है.

सवाल पूछने वाले सरयू राय ने चुनाव को कैसे बनाया रोचक?

सरयू राय सवाल पूछने वाले, मुद्दे उठाने वाले शख्स हैं तो उन्होंने पिछले पांच सालों तक रघुवर दास के कैबिनेट में रहते हुए अपनी ही सरकार से हमेशा तीखे सवाल पूछे. कई दफा उनके सवालों में तीखापन विपक्ष से कहीं अधिक होता था और सरकार में रहते हुए विपक्ष की भूमिका में दिखते. सरयू के इस तेवर से मुख्यमंत्री रघुवर दास हमेशा असहज रहे, लेकिन कभी मुखर नहीं हुए. जब चुनाव नजदीक आया तो अपने टिकट का एलान होता न देखकर वे अपनी सीट छोड़ मुख्यमंत्री के खिलाफ ही निर्दलीय मैदान में कूद गए. सरयू राय को लगता है कि उनका टिकट रघुवर दास के कारण ही रोका गया या कहें कट गया.

रघुवर के मुकाबले जब सरयू उतरे तो आरंभ में यह माना गया कि राय सिर्फ शब्दों-बयानों के माध्यम से रघुवर पर वार करते रहेंगे और मुख्यमंत्री हमेशा की तरह इस सीट पर आसान बढत बनाते हुए दिखेंगे. लेकिन, 68 साल के सरयू राय कभी भी किसी मोर्चे पर हल्के में लिए जाने वाले व्यक्तित्व नहीं हैं. सरयू राय ने खुद की उम्मीदवारी को जनता का चुनाव बना दिया. उन्होंने कहा कि जनता चुनाव लड़ रही है, वह जहां कहती है वहां वे चले जाते हैं. सरयू की ईमानदार और उनके आंदोलनकारी होने की छवि जमशेदपुर पूर्वी सीट पर भाजपा उम्मीदवार रघुवर दास के खिलाफ उनकी लड़ाई को मजबूत बनाने में मददगार बनी. वे जनता के गुस्से, नाखुशी को प्रकट करने का माध्यम बन गए.


रात में लिट्टी पार्टी में शामिल होने के बाद सरयू राय.

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मतदान की तारीख करीब आते-आते हालात ऐसे हुए कि मुख्यमंत्री रघुवर दास को जमशेदपुर में कैंप करना पड़ गया. रघुवर लगातार जनसंपर्क अभियान चला रहे हैं. वहीं, सरयू राय रात में लिट्टी पार्टी एवं पार्काें में सुबह की सैर के जरिए लोगों से मिलते-जुलते रहे जिसमें बड़ी भीड़ जुटती रही. सरयू राय अपने कार्यकर्ताओं एवं समर्थकों के द्वारा तैयार प्लान के अनुसार, मोटरसाइकिल मार्च, पैदल मार्च कर जनता से कनेक्ट होते रहे हैं. चार दिसंबर को जब वे एग्रीको ग्राउंड से मोटरसाइकिल मार्च पर निकलने वाले थे तो लगभग पूरा मैदान पटा पड़ा था. उनके लिए काम करने वाले अधिसंख्य वे लोग हैं जो भाजपा से जुड़े रहे हैं या उसके समर्थक हैं. सरयू ने भी चुनाव के लिए भगवा झंडा ही चुना है, जो थोड़ा हल्के रंग का है, जो उनके व्यक्तित्व की झलक देता है.

जब रघुवर दास बुधवार की रात गोलमुरी के रिफ्यूजी काॅलोनी में जनसंपर्क के लिए निकलते हैं तो वे बच्चों को दुलार करते हैं और उनके साथ तसवीरें खिंचवाते हैं. इसके जरिए वे लोगों को यह याद दिलाते हैं कि 25 साल से वे उन्हें चुन रहे हैं और फिर से चुनें.

मोटरसाइकिल रैली में शामिल सरयू राय.

 

कामबंदी, मंदी और 86 बस्तियों का मालिकाना

 

जमशेदपुर में 86 बस्तियों का मालिकाना एक बड़ा मुद्दा है. सरयू अपनी सभाओं में कहते हैं रघुवर दास ने जितनी मजबूती से 86 बस्तियों का मालिकाना देने का मामला उठाते गए उतनी तेजी से चुनाव दर चुनाव उनका वोट बढता गया और पिछली बार तो वे इसी बदौलत 70 हजार वोटों से जीते. सरयू राय कहते हैं लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद पांच सालों में रघुवर दास ने बस्तियों के लोगों को मालिकाना दिलाने के लिए कुछ नहीं किया जो वह कर सकते थे. यह जमशेदपुर के चुनाव में इस बार सबसे बड़ा मुद्दा है और इसे उन्होंने रघुवर से एक तरह से झटक लिया है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीन दिसंबर की रैली से पूर्व उन्हें एक खुली चिटठी लिख कर यह आग्रह किया कि वे इसे देने का एलान करें. सरयू ने ऐसा कह कर भाजपा पर दबाव बना दिया.


गोलमुरी में बंद पडी केबल कंपनी, जहां कभी पांच हजार लोग काम करते थे.

जमशेदपुर में कामबंदी और मंदी भी एक मुद्दा है. नौकरियों के लिए साकची में जाॅब कंसलटेंसी फर्म चलाने वाले इंजीनियर चंदन सिंह कहते हैं कि उनके आफिस में हर दिन 500 के करीब काॅल आते हैं. यह सुबह से रात नौ बजे तक जारी रहता है. वे कहते हैं कि ऐसा 2018 के अंत से शुरू हुआ और 2019 आते-आते बहुत बढ गया. वे कहते हैं कि कंपनियों में डिमांड रहने पर ही हम मैन पाॅवर कंज्यूम हो सकता है, ऐसे तो हम भी उनके लिए कुछ नहीं कर पाते हैं. चंदन बताते हैं कि आपको यकीन नहीं होता है तो आप एक पर्ची छपवा लीजिए और उसमें अपना नंबर देकर कहीं मोड़ पर खड़े होकर बांट दीजिए या कहीं दीवार पर उसे चिपका दीजिए, देखिए आपके पास कितने काॅल आने लगेंगे.

जमशेदपुर में यूं तो दर्जनों कल-करखाने हैं, लेकिन हालात को समझने के लिए हम गोलमुरी स्थित केबल कंपनी पहुंचे. यह कंपनी 2000 के मार्च महीने से बंद है. जब यह चलती थी तो इसमें 5000 कर्मचारी होते थे आज 940 के आसपास बचे हैं और परिसर की सुरक्षा के लिए कुछ दर्जन गार्ड हैं. केबुल कंपनी के कर्मचारी राम बाबू से हमारी भेंट होती है, उनसे पूछा जब काम नहीं चल रहा तो यहां क्यों हैं. उनका जवाब सुनिए : हमलोग ड्यूटी में हैं, काम नहीं है तो भी आते हैं. यानी वे अब भी किसी चमत्कारिक बदलाव की उम्मीद पाले हुए हैं. राम बाबू 38 साल से इस कंपनी से जुड़े हैं और कहते हैं कि पहले पांच हजार तनख्वाह मिलती थी, फिर घटाकर तीन हजार किया गया और अब डेली 50 रुपये की हाजिरी बनती है. राम बाबू के बच्चे दूसरी जगह काम करते हैं जिससे परिवार चलता है. राम बाबू कहते हैं कि हमें पैसे मिले या नहीं मिले सिक्यूरिटी वालों को समय पर उनकी तनख्वाह मिलती है क्योंकि वे एजेंसी के माध्यम से हैं. इनका घर भी बजरंग नगर बस्ती में है और बस्ती के जो मुद्दे हैं ये भी उसका प्रतिनिधित्व करते हैं.


केबल कंपनी के कामगार राम बाबू, जो शहर के औद्योगिक हाल की स्याह तसवीर पेश करते हैं.

जमशेदपुर पूर्वी के वोटर क्या करेंगे?

जमशेदपुर देश का प्रमुख औद्योगिक शहर है और यहां देश के हर हिस्से के लोग हैं. यह माना जाता है कि छत्तिसगढियों का वोट रघुवर दास को मिलेगा, वहीं, बिहार-यूपी से रोजगार के लिए आकर बसे लोगों का झुकाव सरयू राय की तरफ होगा. एक वरिष्ठ पत्रकार के अनुसार, 86 बस्तियों के मुद्दे पर रघुवर दास यहां से चुनाव जीतते रहे हैं और उस मुद्दे को इस बार सरयू राय ने झटक लिया है तो यह देखना होगा कि उन बस्तियों के लोगों का झुकाव किस ओर होगा.

आम जनता जहां खुल कर अपनी भावनाएं व्यक्त करती हैं, वहीं इस शहर से जुड़े पत्रकार इसे प्रतीकात्मक लड़ाई मानते हैं. उनसे बातचीत में यह सेंस उभर कर आता है कि कम अंतर से ही सही रघुवर जीत जाएंगे क्योंकि उनके पास कमल फूल का निशान है जिस पर यहां के लोग परंपरागत रूप से बड़ी संख्या में मुहर लगाते रहे हैं. लेकिन, रेहड़ी-पटरी वाले, सड़क चलते लोग बदलाव के बयार की तसदीक करते हैं. झारखंड विकास मोर्चा के अभय सिंह एवं कांग्रेस के गौरव वल्लभ को मिलने वाले वोटों की संख्या से भी यहां का परिणाम प्रभावित होगा.

जमशेदपुर से प्रकाशित होने वाली राष्ट्र संवाद पत्रिका के संपादक देवानंद सिंह कहते हैं कि सरयू राय ने रघुवर दास के लिए अभूतपूर्व रूप से चुनौती खड़ी कर दी है. वे कहते हैं कि रघुवर ने पिछली बार एक लाख तीन हजार वोट पाया था, जिसमें इस बार बड़ा हिस्सा सरयू राय के तरफ जाएगा और फिर उन्हें दूसरे समूहों से भी वोट मिलेंगे. हालांकि रघुवर दास चुनाव प्रचार थमने के बाद अपने डोर टू डोर जनसंपर्क से उलट-फेर कर सकते हैं. इसलिए चुनाव में क्या होगा कहा नहीं जा सकता और इसके लिए 23 दिसंबर तक तो इंतजार करना ही होगा.

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