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बाबूलाल मरांडी के भाजपा में शामिल होने से झारखंड की राजनीति कितनी बदलेगी, उमा बनेंगे या येदियुरप्पा?

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राहुल सिंह

झारखंड के पहले मुख्यमंत्री और एक जमाने में झारखंड भाजपा के पोस्टर ब्वाॅय रहे बाबूलाल मरांडी के भाजपा में शामिल होने की चर्चा पिछले दो सप्ताह से हो रही है. झारखंड में हेमंत सरकार के गठन के बावजूद भाजपा द्वारा अपने विधायक दल का नेता नहीं चुने जाने और फिर मरांडी द्वारा अपने दो वरिष्ठ सहयोगियों प्रदीप यादव एवं बंधु तिर्की की राय को दरकिनार कर झारखंड विकास मोर्चा की कार्यकारिणी भंग किए जाने से इन चर्चाओं को बल मिला. बीते कई दिनों से ही रही इन चर्चाओं पर मरांडी और भाजपा ने कोई टिप्पणी नहीं की है. इस मौन को संभावित मित्रता का सूचक माना जा रहा है.

बाबूलाल मरांडी मौलिक रूप से भाजपाई हैं. वे भाजपा के लिए आयातित नेता नहीं रहे हैं, बल्कि उनकी उन अनुषांगिक संगठनों में गढे गए शख्स हैं, जिसकी भाजपा में बेहद मजबूत परंपरा रही है. वे दो दशक से अधिक समय तक विश्व हिंदू परिषद के पूर्णकालिक रहने के बाद भाजपा में गए और दक्षिणी बिहार के सबसे कद्दावर राजनीतिक चेहरे शिबू सोरेन को हराकर संसद पहुंचे थे. बाबूलाल मरांडी की इस उपलब्धि ने उन्हें वाजपेयी मंत्री परिषद में जगह दिलायी और 2000 में राज्य गठन के बाद कड़िया मुंडा जैसे वरिष्ठ सहयोगी को दरकिनार करते हुए वाजपेयी-आडवाणी की जोड़ी ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय लिया.

बाद की कहानियां अलग हैं कि कैसे उन्होंने डोमिसाइल का मुद्दा उठाया. उनके कैबिनेट से उनका तीखा विरोध शुरू हुआ और फिर उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा व अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बने. यह सब होने के बाद डेढ-दो साल की राजनीतिक उपेक्षा झेलने के बाद मरांडी ने अपनी अलग पार्टी झारखंड विकास मोर्चा की नींव रखी.

 

मरांडी का झाविमो माॅडल पाॅलिटिक्स कितना सफल?

 

बाबूलाल मरांडी ने भाजपा छोड़ने के बाद सांसदी भी छोड़ दी थी और कोडरमा से फिर निर्दलीय जीत कर आए थे. उस वक्त झारख्ंाड की राजनीति में उन्हें विराट छवि मिली थी. लेकिन, आने वाले सालों में मरांडी की भाजपा से अलग होकर राजनीति करने की कोशिशें उतनी सफल नहीं हो पायी. इसकी सबसे बड़ी वजह रही, उनके पास समर्पित लोगों का अभाव. मरांडी की पार्टी से चुने जाने वाले अधिसंख्य विधायक बार-बार टूटते रहे. ले-देकर उनके साथ प्रदीप यादव जैसे एक अहम राजनीतिक सहयोगी ही रह जाते थे. हालांकि मरांडी ने अपने सांगठनिक कौशल को साबित किया.

राजनीति की इन दुरुहताओं ने मरांडी की पार्टी को झारखंड की सत्ता में हस्तक्षेप कर पाने की ताकत कभी नहीं दी. हालांकि मरांडी की वह राजनीतिक प्रतिष्ठा व प्रासंगिकता हमेशा रही जिसके वे स्वाभाविक हकदार थे. लेकिन, राजनीति में सम्मान से इतर सत्ता में हस्तक्षेप की ताकत भी चाहिए होती है, जो दलों एवं उसके कार्यकर्ताओं के लिए ईंधन का काम करती है.

क्या देर से मरांडी करने वाले हैं घर वापसी?

 

बाबूलाल मरांडी के भाजपा में वापस लौटने की अटकलें या कयास पहली बार नहीं लगी है. पिछले विधानसभा चुनाव के बाद भी यह चर्चा चली थी कि मरांडी को अमित शाह ने भाजपा में शामिल होने व अपनी पार्टी का विलय करने का प्रस्ताव दिया है. हालांकि तब ऐसा हुआ नहीं, हां मरांडी की पार्टी के ज्यादातर विधायक जरूर भाजपा में शामिल हो गए थे.

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भाजपा की राजनीति आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों की आंतरिक ताकत व उर्जा से संचालित होती है. भाजपा में बहुत कम ऐसा होता है जब लंबे अरसे तक पार्टी से बाहर रहने के बाद वापस आया कोई नेता अपने पुराने अस्तित्व को पा लेता हो. कल्याण सिंह, उमा भारती आदि ऐसे नाम हैं जो वापसी के बाद भाजपा में वैसी प्रासंगिकता नहीं बना सके, जैसी पहले थी. हां, बीएस येदियुरप्पा जैसे अपवाद भी हैं, जो अपनी पार्टी के विलय के साथ लौटे भी तो एक बार फिर कर्नाटक भाजपा के चेहरा बन गए. प्रदेश अध्यक्ष से लेकर मुख्यमंत्री तक सभी पदों के पहले और इतने मजबूत दावेदार कि दूर तक कोई चुनौती नजर नहीं आयी.

तो ऐेस में यह सवाल उठना लाजिमी ही है कि क्या बाबूलाल मरांडी झारखंड भाजपा में उमा भारती बनेंगे या फिर येदियुरप्पा?

यहां एक बात पर गौर किया जाना चाहिए कि वीएस येदियुरप्पा भी कर्नाटक की बहुसंख्यक लिंगायत समुदाय से आते हैं और इसके कारण वे बाकी नेताओं पर बढत हासिल कर लेते हैं. उसी तरह मरांडी भी झारखंड के सबसे बड़े समुदाय आदिवासी वर्ग से आते हैं और एक तरह से इनका प्रतिनिधित्व करते हैं. मरांडी ने भी येदियुरप्पा की तरह हमेशा राजनीतिक प्रासंगिकता बनाये रखी.

ऐसे में मरांडी को लेकर संभावनाएं हैं. यह भी कहा जाता है कि भाजपा ने अपने विधायक दल का नेता इसलिए नहीं चुना है, क्योंकि उस पद पर बाबूलाल मरांडी को बिठाना है. यानी अगर विपक्ष के नेता की कुर्सी की शर्त पर उनकी वापसी होती है तो यह उनके राजनीतिक भविष्य के लिए अहम होगा.

रघुवर दास विधानसभा चुनाव हार गए हैं, अर्जुन मुंडा केंद्र में हैं. ऐसे में पार्टी के पास अपने मौजूदा विधायकों में से किसी को नेता चुनने का विकल्प है या फिर बाबूलाल मरांडी जैसे कद्दावर शख्स को पुनः पार्टी में शामिल कर उन्हें वह यह पद दे सकती है.

 

भाजपा व राज्य की राजनीति पर क्या असर हो सकता है?

 

बाबूलाल मरांडी के भाजपा में शामिल होने से बहुत से ऐसे लोग जो मौजूदा हालात में वैकल्पिक नेतृत्व मिलने की उम्मीदें पाल रखे हैं, उन्हें निराशा होगी. सीपी सिंह व नीलकंठ सिंह मुंडा जैसे नेता पार्टी के अंदर से विधायक दल के नेता के पद के दावेदार हो सकते हैं, लेकिन मरांडी के कारण फिर उन्हें मौका नहीं मिल सकता है. मरांडी के आने से आने वाले सालों में उनके लिए भी नेतृत्व हासिल करने में दिक्कत हो सकती है जो पहले झारखंड भाजपा व सरकार का नेत्त्व कर चुके हैं. जाहिर है, ऐसे दो ही नाम हैं अर्जुन मुंडा और रघुवर दास. घर वापसी के बाद येदियुरप्पा ने भी भाजपा के दो पूर्व मुख्यमंत्री को किनारे कर कर्नाटक भाजपा पर कब्जा जमाया. (वहीं, उमा भारती के साथ शिवराज सिंह चौहान ने यह शर्त लगा दी थी कि उन्हें मध्यप्रदेश में सक्रिय न किया जाये.)

बाबूलाल मरांडी भाजपा को 28 में से मात्र दो जनजातीय सीटों पर सीमट जाने की निराशा में मददगार हो सकते हैं. राज्य में जनजातीय सीटें संताल, कोल्हान व दक्षिण छोटानागपुर में ही प्रमुख रूप से हैं. इनमें संताल व कोल्हान पर झामुमो का जबकि दक्षिण छोटानागपुर में भाजपा का वर्चस्व रहा है. लेकिन, भाजपा ने इस बार झामुमो गठबंधन ने दक्षिण छोटानागपुर की जनजातीय सीटों पर भी बढत हासिल कर ली.

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आज जब मरांडी का जन्मदिन है तो क्या दो-चार दिन बाद ही मोदी-शाह उन्हें इसका सबसे शानदार उपहार देते हैं, या फिर, पूर्व के कयासों की तरह इस बार भी बस यह एक कयास मात्र ही रह जाएगा.

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